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कहानी -4-राजनीति- गुलिस्तान-ए-सा’दी

सादी शीराज़ी

कहानी -4-राजनीति- गुलिस्तान-ए-सा’दी

सादी शीराज़ी

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    अ’रब के चोरों के एक गिरोह ने एक पहाड़ी पर अड्डा जमा लिया था। उनके डर से यात्रियों ने उधर का रास्ता ही छोड़ दिया। शहर के लोग उनके डर से काँपते थे। बादशाह के सिपाही भी उन्हें पकड़ने की हिम्मत करते। कारण यह था कि पहाड़ी पर चोरों के लिए एक बहुत ही सुरक्षित जगह थी, जहाँ से वे आसानी से दूसरों पर हमला कर सकते थे।

    वहाँ के कुछ अनुभवी और साहसी लोगों ने चोरों को पकड़ने का फ़ैसला किया। उन्हें डर था कि यदि चोर उस पहाड़ी पर कुछ दिन और जमे रहे, तो फिर उनको वहाँ से निकाल पाना असंभव हो जाएगा।

    'जिस पौधे ने अभी जड़ पकड़ी है, उसे तो कोई भी आसानी से उखाड़ कर फेंक सकता है। उसे छोड़ दिया जाए, तो वह बहुत बड़ा पेड़ बन जाएगा और फिर उसे औज़ारों की मदद से भी उखाड़ना मुश्किल होगा।'

    'निकास पर नदी को केवल एक सलाई में रोक सकते हो। वही जब बढ़कर फैलाव पा जाती है तो हाथी की पीठ पर सवार होकर भी उसे पार करना मुश्किल है।'

    उन्होंने चोरों की गतिविधियों का पता लगाने के लिए एक जासूस लगा दिया। संयोग की बात, एक दिन चोर पहाड़ी से निकल कर कहीं लूट मार करने गए हुए थे। जासूस से यह सूचना पाते ही कुछ बहादुर सिपाही पहाड़ी पर जाकर छिप गए। सूर्यास्त के पश्चात् चोर जब लूट-मार करके पहाड़ी पर वापस आए तो बहुत थके हुए थे। उन्होंने अपने हथियार खोल कर रख दिए और लूट का माल एक तरफ़ डाल दिया। लेटते ही वे गहरी नींद में डूब गए। रात हो चुकी थी और गहरा अंधकार छाया हुआ था।

    सूरज की टिकिया अंधेरे में इस तरह छिप गई, जैसे हज़रत यूनुस मछली के पेट में चले गए हों।

    अच्छा अवसर देखकर सिपाही बाहर निकले। वे सोते हए चोरों की ओर बढ़े और उन सबके हाथ रस्सी से बाँध दिए। सुब्ह होते ही उन्हें बादशाह के दरबार में पेश किया गया। बादशाह ने उन सबको मृत्यु-दंड दे दिया।

    उन चोरों में एक नौजवान भी था, जिसका शरीर सुन्दर तथा सुगठित और मुख आकर्षक था।उसे देखकर एक वज़ीर को बड़ी दया आई।उसने बादशाह से कहा, हुज़ूर यह लड़का अभी ना-समझ है। इसने अभी जीवन का कोई सुख नहीं देखा और इसे अभी कोई अनुभव है। यदि आप इसे मृत्यु-दंड से मुक्त कर दें तो आपकी बड़ी कृपा होगी।

    बादशाह को वज़ीर की बात पसन्द आई। उसने कहा, जिस बच्चे की नस्ल ही ख़राब है, वह अच्छा कैसे बन सकता है?

    'दुष्ट लोगों को तो समूल नष्ट कर देना ही उचित है।'

    'आग को बुझा देना, लेकिन चिन्गारी छोड़ देना, या साँप को मार डालना लेकिन उसके बच्चे को छोड़ देना कहाँ की बुद्धिमानी है?'

    'बादलों से चाहे अमृत ही क्यों बरसे, बेंत के पेड़ पर फल नहीं लग सकते।'

    'नीच को सुधारने में तू अपना समय नष्ट मत कर। नरकुल से शक्कर नहीं बन सकती।'

    'दुष्ट व्यक्ति को सुधारना ऐसा ही है, जैसा गोल गुम्बद पर अख़रोट को रोकने की कोशिश करना।'

    वज़ीर निरुत्तर हो गया। शिष्टाचारवश उसने बादशाह के कथन की सराहना की, फिर भी उसने निवेदन किया।

    'इसमें कोई सन्देह नहीं है कि यह लड़का बुरे लोगों की संगति में रहा, तो बुरा ही बनेगा; परन्तु मुझे आशा है कि अभी यह सुधर सकता है। यदि भले आदमियों के बीच इसे रखा जाए, तो यह भी भला आदमी बन जाएगा। अभी तक इसमें बुरे लोगों का असर नहीं दिखाई देता। संगति से ही बच्चा सुघर या बिगड़ जाता है। क़ुरान-शरीफ़ में कहा गया है: 'जन्म से हर बच्चा मुसलमान ही होता है, बाद में उसके माँ-बाप चाहे उसे यहूदी बना लें, चाहे नसरानी, चाहे मजूसी।'

    'हज़रत नूह के बेटों ने बुरे लोगों के साथ रहना शुरू’ कर दिया था, जिसका परिणाम यह हुआ कि उनके वंश से पैग़म्बरी सदा के लिए चली गई। परन्तु कहफ़ के दरवेशों के साथ रहकर उनका कुत्ता भी शरीफ़ बन गया।'

    जब वज़ीर ने इतना कहा, तो और लोग भी उस लड़के की सिफ़ारिश करने लगे। बादशाह ने उस लड़के को यह कहते हुए छोड़ दिया कि, 'हम इसे मुआ’फ़ किए देते हैं, हालाँकि यह मुनासिब नहीं लगता। शायद तुझे मा’लूम नहीं है कि ज़ाल ने रुस्तम से क्या कहा था?

    'दुश्मन को कभी कमज़ोर और बे-सहारा नहीं समझना चाहिए।'

    क्या तूने नहीं देखा कि छोटी-सी नदी भी पानी से भर जाती है, तो वह ऊँट को उसके बोझ समेत बहा ले जाती है।

    बादशाह के हुक्म से उस लड़के को उसी वज़ीर की देख-रेख में रख दिया गया और बड़े लाड-प्यार से उसकी परवरिश होने लगी। उसे शिक्षा देने के लिए एक उस्ताद रख दिया गया, जिसने उसे सभ्य समाज में रहने सहने का ढंग तथा अपने से बड़ों के साथ बात-चीत करने का सलीक़ा सिखाया।

    एक दिन वज़ीर बादशाह से उस लड़के की प्रशंसा करने लगा कि उस पर शिक्षा तथा अच्छी संगति का असर पड़ा है और वह एक शरीफ़ आदमी बन रहा है।

    बादशाह सुनकर मुस्कुराया और बोला, 'भेड़िए का बच्चा भेड़िया ही बनेगा, चाहे उसकी परवरिश इन्सानों के बीच क्यों हुई हो।'

    इस बात को लगभग दो वर्ष बीत गए। उसी मुहल्ले में कुछ बदमाश आकर रहने लगे। धीरे-धीरे वह चोर लड़का भी उनमें जा मिला। उन्हीं की मदद से एक दिन उसने वज़ीर तथा उसके दोनों बेटों को मार डाला और उनकी सारी दौलत लेकर चम्पत हो गया।

    अन्त में वह पक्का चोर बन गया और अपने पिता की जगह उसी पहाड़ी पर जाकर रहने लगा। बादशाह ने जब यह सुना तो कहने लगा, 'शिक्षा प्राप्त करने पर भी दुष्ट अपनी दुष्टता नहीं छोड़ता। ख़राब लोहे से अच्छी तलवार कैसे बन सकती है?

    'यह ठीक है कि वर्षा ज़मीन को उपजाऊ बनाती है; परन्तु सब जगह एक-सी पैदावार नहीं होती। यदि उपवन में लाला उगता है, तो बंजर ज़मीन में झाड़ियाँ।'

    बंजर ज़मीन में फल नहीं उग सकते। तू अपनी मेहनत को बेकार मत कर।'

    'दुष्टों के साथ भलाई करना उतना ही बुरा है, जितना सज्जनों के साथ दुष्टता करना।'

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