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ग़ज़ल
फूले है गरचे बाग़ में बुलबुल हज़ार शाख़उस सर्व-क़द को देखे तो हो शर्मसार शाख़
ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
दीगर ज़े-शाख़-ए-सर्व सही बुलबुल-ए-सुबूरगुलबाँग ज़द कि चश्म-ए-बद अज़ रू-ए-गुल ब-दूर
हाफ़िज़
शे'र
शाख़-ए-गुल हिलती नहीं ये बुलबुलों को बाग़ मेंहाथ अपने के इशारे से बुलाती है बहार
मिर्ज़ा मज़हर जान-ए-जानाँ
ग़ज़ल
क़फ़स की तीलियों से ले के शाख़-ए-आशियाँ तक हैमिरी दुनिया यहाँ से है मिरी दुनिया वहाँ तक है