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शे'र
अगर ये सर्द-मेहरी तुज को आसाइश न सिखलातीतो क्यूँकर आफ़्ताब-ए-हुस्न की गर्मी में नींद आती
मिर्ज़ा मज़हर जान-ए-जानाँ
गूजरी सूफ़ी काव्य
तुज सें मेरे नज़दीक है लालन तू क्यूँ नीं पूछता
तुज सें मेरे नज़दीक है लालन तू क्यूँ नीं पूछताडूबा ख़ुदी के गच में पास तूँ है दलदल ऐ सखी
पीर सय्यद मोहम्मद अक़दस
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ना'त-ओ-मनक़बत
तुझ से फ़रियाद है ये गुंबद-ए-ख़ज़्रा वालेतंग करते हैं ग़ुलामों को ये दुनिया वाले
नसीर नियाज़ी
ना'त-ओ-मनक़बत
अज्ञात
ना'त-ओ-मनक़बत
तुझ पे सदक़े है ज़माना शह-ए-ख़ूबाँ तू हैअहल-ए-उल्फ़त के लिए हासिल-ए-ईमाँ तू है
फ़ना बुलंदशहरी
ना'त-ओ-मनक़बत
ऐ ज़मीं तुझ पर नुज़ूल-ए-आसमाँ होने को हैगोया नूर ख़ालिक़-ए-'आलम अ'याँ होने को है
सय्यद फ़ैज़ान वारसी
गूजरी सूफ़ी काव्य
ख़ल्वत जल्वत 'बाजना' तुझ मुझ होए सो होए
ख़ल्वत जल्वत 'बाजना' तुझ मुझ होए सो होएभीं तूँ लो नहीं मेरा तुझ बिन और न कुए
शैख़ बहाउद्दीन बाजन
बैत
अब तलक तुझ पे न इस राज़ का इज़हार किया
अब तलक तुझ पे न इस राज़ का इज़हार कियाजान आती है मेरी जान जो तू आती है
शाह तक़िउद्दिन मनेरी
ना'त-ओ-मनक़बत
ऐ सनम तुझ पे हैं क़ुर्बां गुल-ओ-आईना-ओ-शमाहैं तिरे रुख़ से पशेमाँ गुल-ओ-आईना-ओ-शमा




