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कलाम
सुब्ह-ए-बहार आई थी ले कर रुत भी नई शाख़ें भी नईग़ुंचा-ओ-गुल से प्यार है लेकिन शाख़ से नफ़रत आज भी है
शकील बदायूँनी
कलाम
इशारों से निगाहों से बहुत कुछ मनअ' करता हूँक़फ़स ही पर झुकी पड़ती है शाख़-ए-आशियाँ फिर भी
सीमाब अकबराबादी
कलाम
न शाख़-ए-गुल ही ऊँची है न दीवार-ए-चमन बुलबुलतिरी हिम्मत की कोताही तिरी क़िस्मत की पस्ती है