Sufinama

उस ने भरी महफ़िल को दीवानः बना डाला

संजर ग़ाज़ीपुरी

उस ने भरी महफ़िल को दीवानः बना डाला

संजर ग़ाज़ीपुरी

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    उस ने भरी महफ़िल को दीवानः बना डाला

    ख़ुद शम्अ' बना सब को परवानः बना डाला

    दिल अपना मोहम्मद का काशाना बना डाला

    उजड़े हुए इस घर को शाहाना बना डाला

    वहदत की पिला कर मय उस साक़ी-ए-कौसर ने

    एक आलम-ए-कसरत को मस्ताना बना डाला

    दिखला के झलक अपनी अल्लाह ने मूसा को

    दीवानः बना डाला परवानः बना डाला

    चुल्लू से पिला साक़ी पैमानः नहीं तो क्या

    हम ने इन्हीं हाथों को पैमाना बना डाला

    अब याद मिरे दिल में हर-वक़्त बुतों की है

    अल्लाह का घर मैं ने बुत-ख़ानः बना डाला

    'संजर' को ख़ैर अपनी कुछ भी नहीं वहशत हैं

    उल्फ़त ने उसे ऐसा दीवान: बना डाला

    स्रोत :
    • पुस्तक : दीवान-ए-संजर अल-मा'रूफ़ गुलदस्ता-ए-कलाम-ए-संजर (पृष्ठ 13)
    • रचनाकार : संजर ग़ाज़ीपूरी
    • प्रकाशन : शैख़ ग़ुलाम हुसैन ऐंड संस ताजिरान-ए-कुतुब, कश्मीरी बाज़ार, लाहौर

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