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शे'र
निकल कर ज़ुल्फ़ से पहुँचूँगा क्यूँकर मुसहफ़-ए-रुख़ परअकेला हूँ अँधेरी रात है और दूर मंज़िल है
अकबर वारसी मेरठी
ना'त-ओ-मनक़बत
बा-अदब आओ यहाँ पर है दयार-ए-फ़ातिमाख़ुल्द की भी ख़ुल्द है यारो मज़ार-ए-फ़ातिमा
रफ़ीक़ अशरफ़ी
ना'त-ओ-मनक़बत
दयार-ए-मुस्तफ़वी के सफ़र की बात करोजो कर सको तो मोहम्मद के दर की बात करो
अ'ब्दुल सत्तार नियाज़ी
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नज़्म
हाज़िर हुज़ूर में शो'रा-ए-दयार हैं
हाज़िर हुज़ूर में शो'रा-ए-दयार हैंमद्दाह-ए-हज़रत-ए-शह-ए-आली-वक़ार हैं
फरोग़ वारसी
नज़्म
दयार-ए-इश्क़ में अपना मक़ाम पैदा कर
दयार-ए-इश्क़ में अपना मक़ाम पैदा करनया ज़माना नए सुब्ह ओ शाम पैदा कर
अल्लामा इक़बाल
कलाम
कोई अजनबी-सा दयार था यही वक़्त होगा पहल गएसर-ए-रह-गुज़र वो नज़र मिली तो फ़ज़ा में फूल बिखर गए
अज्ञात
क़िता'
अफ़सर नारवी
कलाम
अगर ऐ नसीम-ए-सहर तिरा हो गुज़र दयार-ए-हिजाज़ मेंमिरी चश्म-ए-तर का सलाम कहना हुज़ूर-ए-बंदा-नवाज़ में
अख़्तर शीरानी
ग़ज़ल
फ़स्ल-ए-गुल का ग़म दिल-ए-नाशाद पर बाक़ी रहाहश्र लग ये मुज़लिमा सय्याद पर बाक़ी रहा
सिराज औरंगाबादी
ना'त-ओ-मनक़बत
है शम्-ए'-तजल्ली रुख़-ए-दिल जु-ए-मोहम्मदपरवाना-सिफ़त खिंचते हैं दिल सू-ए-मोहम्मद


