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शे'र
निकल कर ज़ुल्फ़ से पहुँचूँगा क्यूँकर मुसहफ़-ए-रुख़ परअकेला हूँ अँधेरी रात है और दूर मंज़िल है
अकबर वारसी मेरठी
सूफ़ी कहानी
तपते बयाबान में एक शैख़ का नमाज़ पढ़ना और अहल-ए-कारवाँ का हैरान रह जाना- दफ़्तर-ए-दोउम
एक चटयल मैदान में एक ज़ाहिद ख़ुदा की इ’बादत में मसरूफ़ था। मुख़्तलिफ़ शहरों से हाजियों
रूमी
ना'त-ओ-मनक़बत
हर मुसाफ़िर से मैं ख़ाक-ए-रह-ए-तैबा माँगूँख़ुश्क सहरा हूँ मगर इ’श्रत-ए-दरिया माँगूँ
रईस वारसी
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ना'त-ओ-मनक़बत
रह-गुज़ार-ए-'इश्क़ की हर-गाम थी हालत 'अजीबऔर मुसाफ़िर के मुसलसल शौक़ की हिम्मत 'अजीब
डॉ. मंसूर फ़रीदी
फ़ारसी कलाम
दिला ख़ाक-ए-रह-ए-कू-ए-मोहम्मद शौ मोहम्मद शौज़े-हर-सूए बिया सू-ए-मोहम्मद शौ मोहम्मद शौ
शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
कलाम
न तू माह बन के फ़लक पे रह न तू फूल बन के चमन में आये तमाम जल्वे समेट कर किसी दिल-गुदाज़-ए-फबन में आ


