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दोहा
रहिमन यो सुख होत है बढ़त देखि निज गोत
रहिमन यो सुख होत है बढ़त देखि निज गोतज्यों बड़री अँखियाँ निरखि आँखिन को सुख होत
रहीम
कृष्ण भक्ति संत काव्य
बन बाग़ तडागनि कु जंगली अखियाँ सुख पाइहै देखि दईअब गोकुल माँझ बिलोकियैगी वो गोप सभाग सुभाय रई
रसखान
गीत
सुख जो बरसात का क़िस्मत में न था मोरे बदाभरी वर्षा में वह परदेसी भयो मोसे विदा
शाह तुराब अली क़लंदर
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राग आधारित पद
राग धनाश्री -सो सुख देहु जागत गुरु मोही
सो सुख देहु जागत गुरु मोही,सो सुख देहु जागत गुरु मोही।।
तुरसीदास
छंद
जगत विदित बूंदी नगर, सुख सम्पति को धाम
जगत विदित बूंदी नगर, सुख सम्पति को धाम।कलिजुगहू मै सत्यजुग, तहां करत विश्राम।।
मतिराम
पद
क्या कहूँ भाई अब हरि सुख पाई
क्या कहूँ भाई अब हरि सुख पाई,सकल ही गति मेरी हरी ने चुराई।।ध्रु0।।
केशव स्वामी
पद
पायो मनोहर श्याम सुन्दर सुरति सुख मानो रली।
पायो मनोहर श्याम सुन्दर सुरति सुख मानो रली।नव नेह अति रस रंग बाढयो दान दे उठि घर चली।।
हरिदास
दोहरा
मूरख लोक सदा सुख सौंदे
मूरख लोक सदा सुख सौंदे अते कमावन पैसा ।ना कुछ ऊच ना नीच पछानन अते प्रेम ना जानन कैसा ।
हाशिम शाह
कवित्त
पानिप के पुंज, सुघराई के सदन, सुख
पानिप के पुंज, सुघराई के सदन, सुख-सोभा के समूह और सावधान मौज के।
मुबारक अली बिलग्रामी
दोहा
पराधीनता दुख महा, सुख जग मे स्वाधीन।
पराधीनता दुख महा, सुख जग मे स्वाधीन।सुखी रमत सुक बन विषे, कनक पींजरे दीन।।
दीनदयाल गिरि
साखी
जो सुख नहिं तू दे सके, तो दुख काहू मत दे।
जो सुख नहिं तू दे सके, तो दुख काहू मत दे।ऐसी रहनी जो रहे, सोई शब्द रस ले।।
शालीग्राम
पद
कबहुँ कबहुँ मन इत उत जात यातें कौन है अधिक सुख।
कबहुँ कबहुँ मन इत उत जात यातें कौन है अधिक सुख।बहु भांतिन तें घर आनि राखो नाहिं तो पावतो दुख।।
हरिदास
पद
सकल सुख धरन मंगल करन, उत्तम शरण है ये ही
सकल सुख धरन मंगल करन, उत्तम शरण है ये ही ।श्री अरहत आदिक पूज्य पदवी, करन है ये ही।।
चम्पा देवी
छंद
सुख लहत यों फल चखन मनु पीयत मधुप सो नीति सों।
सुख लहत यों फल चखन मनु पीयत मधुप सो नीति सों।मनु मगन ब्रह्मानन्द रस जोगीस जो मुनिगन प्रीति सों।।

