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बैत
ज़रा ऐ गर्दिश-ए-दौराँ के मारो
ज़रा ऐ गर्दिश-ए-दौराँ के मारोये सोचो हम भी ज़ेर-ए-आसमाँ हैं
अतहर नियाज़ी
बैत
मस्नद-ए-पीरी पे यूं जम कि ना बैठो तुम नसीर
मस्नद-ए-पीरी पे यूं जम कि ना बैठो तुम नसीरकल को उठ जाओगे ये सारा तमाशा छोड़कर
पीर नसीरुद्दीन नसीर
बैत
मर्हबा ऐ दिल-ए-ख़ुश-बख़्त मदीना आया
मर्हबा ऐ दिल-ए-ख़ुश-बख़्त मदीना आयाशुक्र कर हक़ का कि पहुँचा है कहाँ आज की रात
शाह अब्दुल क़ादिर बदायूँनी
बैत
ए सुब्ह-ए-सआ'दत ज़े-जबीं तू हुवैदा
ए सुब्ह-ए-सआ'दत ज़े-जबीं तू हुवैदाईं हुस्न चे हुस्न अस्त तबारक तआ'ला
फरोग़ वारसी
बैत
ग़म ब-ज़ाहिर तो बहुत तल्ख़ है लेकिन ऐ 'आह'
ग़म ब-ज़ाहिर तो बहुत तल्ख़ है लेकिन ऐ 'आह'यही इंसान को इंसान बना देता है
आह संभली
ग़ज़ल
ऐ माह-ए-ख़ुश-रू कह दे अब जो बात हैकि पैमाना-ए-तजस्सुसस-ए-मन मुंतज़िर-ए-ब-इल्तिफ़ात है
अहमद अब्दुल रहमान
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
मावा-ए-तू अज़ का'ब:-ओ-बुत-ख़ान: कुदाम अस्तऐ ख़ान: बर अन्दाज़ तोरा ख़ान: कुदाम अस्त
साएब तबरेज़ी
सूफ़ी उद्धरण
लोग दोस्त को छोड़ देते हैं बहस को नहीं छोड़ते।
लोग दोस्त को छोड़ देते हैं बहस को नहीं छोड़ते।