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सूफ़ी कहावत
हमनशीन-ए- तू अज़ तू बा बायद। ता तोरा अक़्ल ओ दीन बे अफ़ज़ायद
आपका साथी आपसे बढ़कर होना चाहिए, ताकि आपकी बुद्धि और धर्म में वृद्धि हो
वाचिक परंपरा
कुंडलिया
बंदा बाजी झूठ है, मत सांची करमान।
बंदा बाजी झूठ है, मत सांची करमान।कहां बीरबल गंग है, कहां अकब्बर खान।।
दीन दरवेश
कुंडलिया
माया-माया करत है, खरच्या खाया नाहिं।
माया-माया करत है, खरच्या खाया नाहिं।सो नर ऐसे जाहिंगे, ज्यों बादर की छाहिं।।
दीन दरवेश
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कविता
पिय के संग एरी नार चौसर क्यों नहि खेले
पिय के संग एरी नार चौसर क्यों नहि खेलेइश चौसर का निपट सार जोबना यह दिन है तिन चार
अज़ीज़ दीन
कुंडलिया
हिंदू कहें सो हम बड़े, मुसलमान कहें हम्म ।
हिंदू कहें सो हम बड़े, मुसलमान कहें हम्म ।एक मूंग दो झाड़ हैं, कुण ज्यादा कुण कम्म।।
दीन दरवेश
ना'त-ओ-मनक़बत
मुस्तफ़ा के दीन की बक़ा मिरे हुसैन हैंया'नी राज़-ए-वहदत-ए-ख़ुदा मिरे हुसैन हैं
आमिर रहमती
ना'त-ओ-मनक़बत
अहल-ए-सफ़ा के दीन का क़िब्ला हुसैन हैंअहल-ए-नज़र के वास्ते का'बा हुसैन हैं
सय्यद फ़ैज़ान वारसी
ना'त-ओ-मनक़बत
तुम मेरा दीं मेरी दुनिया या हज़रत बाबा ताजुद्दीनतुम मेरे हो सब कुछ है मिरा या हज़रत बाबा ताजुद्दीन
ज़हीन शाह ताजी
गूजरी सूफ़ी काव्य
क़िस्सा हाजी मगरोली शाह
हाजी ने तब कहा यूँ देखें देवल सो तेरा,तू साथ चल हमारे किस शान का है डेरा।
शैख़ दीन
ना'त-ओ-मनक़बत
हुसैन तुम ने नबी के दीं को लहू से अपने नुमू किया हैन मिट सकेगा कभी किसी से ये काम ऐसा लहू किया है
आमिर रहमती
दोहा
साध का अंग - 'दया' दान अरु दीनता दीना-नाथ दयाल
दया दान अरु दीनता दीना-नाथ दयालहिरदै सीतल दृष्टि सम निरखत करैं निहाल
दया बाई
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
ब-ग़ैर अज़ाँ कि बे-शुद दीन-ओ-दानिश अज़ दस्तमबया ब-गो कि ज़े-इश्क़त चे तरफ़ बर बस्तम




