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ना'त-ओ-मनक़बत
फ़रमाया शह ने है यही मर्ज़ी-ए-किर्दगारदलदल पे चढ़ के खींच ली फिर अपनी जुल्फ़िक़ार
क़ैसर रत्नागीरवी
गूजरी सूफ़ी काव्य
तुज सें मेरे नज़दीक है लालन तू क्यूँ नीं पूछता
तुज सें मेरे नज़दीक है लालन तू क्यूँ नीं पूछताडूबा ख़ुदी के गच में पास तूँ है दलदल ऐ सखी
पीर सय्यद मोहम्मद अक़दस
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