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ग़ज़ल
इक बसीत-ए-एहसास इक शौक़-ए-नुमायाँ चाहिएइ'श्क़ की नब्ज़ों में रक़्स मौज-ए-तूफ़ाँ चाहिए
अख़्तर अलीगढ़ी
कलाम
ज़िंदगी एक किराए का घर है इक न इक दिन बदलना पड़ेगामौत जब तुझ को आवाज़ देगी घर से बाहर निकलना पड़ेगा
क़ैसर सिद्दीक़ी समस्तीपुरी
ना'त-ओ-मनक़बत
ऐ शाह-ए-ज़मन ऐ ख़ैर-ए-बशर बस एक नज़र बस एक नज़रलिल्लाह करें मुझ 'आसी पर बस एक नज़र बस एक नज़र
अब्दुल हमीद साबरी
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ग़ज़ल
आज इक इक बादा-कश मसरूर मय-ख़ाने में हैताज़ा ताज़ा इसके उसके सब के पैमाने में है
पीर नसीरुद्दीन नसीर
ग़ज़ल
तुझे ढूँढती हैं नज़रें मुझे इक झलक दिखा जामिरी ज़िंदगी के मालिक मिरी ज़िंदगी में आ जा
फ़ना बुलंदशहरी
ना'त-ओ-मनक़बत
वस्ल इक हक़ीक़त थी हिज्र इक फ़साना थाहम थे जब मदीना में वो भी क्या ज़माना था
शाह अब्दुल क़दीर बदायूँनी
शे'र
‘अयाज़’ इक बेश-क़ीमत सा तुझे नुक्ता बताता हूँतुम अपने आपको समझो ख़ुदा क्या है ख़ुदा जाने
बेख़ुद सुहरावर्दी
ना'त-ओ-मनक़बत
इक रिंद पे वल्लाह ये फ़ैज़ान-ए-मदीनारग-रग में नज़र आते हैं सुल्तान-ए-मदीना
अब्दुल हादी काविश
ना'त-ओ-मनक़बत
दिखा दे जज़्ब-ए-दिल की इक झलक 'इश्क़-ए-नबी अपनीतमन्ना है मदीने में गुज़ारूँ ज़िंदगी अपनी
