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फ़ारसी सूफ़ी काव्य
अल-ग़ियास ऐ ग़ौस-ए-आ'ज़म अल-ग़ियासअल-ग़ियास ऐ क़ुत्ब-ए-अकरम अल-ग़ियास
शाह अब्दुल क़ादिर बदायूँनी
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नज़्म
या पीर अल-ग़ियास
लाया तुम्हारे पास हूँ या पीर अल-ग़ियासकर आह के क़लम से मैं तहरीर अल-ग़ियास
शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
ग़ज़ल
हमें दुनिया का कुछ ग़म है न हम को फ़िक्र-ए-’उक़्बा हैहमारे सर पे हैं साया-फ़िगन महबूब-ए-यज़्दानी
इकरामुद्दीन उस्मानी
शे'र
लाया तुम्हारे पास हूँ या पीर अल-ग़ियासकर आह के क़लम से मैं तहरीर अल-ग़ियास
शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
ना'त-ओ-मनक़बत
जल्वा-ए-नूर-ए-ख़ुदा सल्ले-'अला कुछ और है'अज़्मत-ए-मौला 'अली शेर-ए-ख़ुदा कुछ और है
महमूद अहमद रब्बानी
ना'त-ओ-मनक़बत
जान-ए-'आलम हैं नबी और हैं ’अली जान-ए-नबीये भी तो मौलाई है समझा गया कुछ और है
अमजद रब्बानी
दोहा
परि कटारी विरह की टूट रही उर साल
परि कटारी विरह की टूट रही उर सालमूएँ पीछैं जो मिलौ जीयत मिलौ 'जमाल'
जमाल
कलाम
मज़हबाँ दे दरवाज़े उच्चे राह रब्बाना मोरी हूपंडत ते मुलवाणे कोलों छुप छुप लंघिये चोरी हू
सुल्तान बाहू
दोहा
रहिमन राम न उर धरै रहत बिषय लपटाय
रहिमन राम न उर धरै रहत बिषय लपटायपसु खर खात सवाद सों गुर गुलियाए खाय
रहीम
दोहा
लोक जू काजर की लगी अंग लगे उर लाल
लोक जू काजर की लगी अंग लगे उर लालआज उनीदे आइए जागे कहाँ 'जमाल'