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ना'त-ओ-मनक़बत
जहान-ए-बे-हक़ीक़त में हक़ीक़त ले के आया हूँमैं दिल में कमली वाले की मोहब्बत ले के आया हूँ
हामिद वारसी गुजराती
ना'त-ओ-मनक़बत
हक़ीक़त मेरे ख़्वाजा की कोई बे-’इल्म क्या जानेख़ुदा ही ख़ूब जाने है ओ या बस मुस्तफ़ा जाने
ज़ैन-उल-आबिदीन चिश्ती
ना'त-ओ-मनक़बत
तुम्हीं को देखता है देखने वाला हक़ीक़त कातुम्हीं को पा रहा है पाने वाला हुस्न-ए-क़ुद्रत का
ज़हीन शाह ताजी
ना'त-ओ-मनक़बत
वस्ल इक हक़ीक़त थी हिज्र इक फ़साना थाहम थे जब मदीना में वो भी क्या ज़माना था
शाह अब्दुल क़दीर बदायूँनी
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दोहा
ताज पहेली जानता, उलटे उसके कान
ताज पहेली जानता, उलटे उसके कानअली सुने दीपावली, राम सुने रमज़ान
डॉ. अफ़रोज़ ताज
दोहा
माँगें मदद बाबुल से, मनको भावें आम
माँगें मदद बाबुल से, मनको भावें आमहाथ हटा हथियार से, हाथ यार का थाम
डॉ. अफ़रोज़ ताज
दोहा
बाँसुरिया के भाग पर, अचरज करता क्यूँ
बाँसुरिया के भाग पर, अचरज करता क्यूँमन में छेद छिदाए, तब लगी पिया के मूँ
डॉ. अफ़रोज़ ताज
दोहा
हाथी रूप गणेश जी, बन्दर में हनुमान
हाथी रूप गणेश जी, बन्दर में हनुमानमानव जात के रूप में, खुले फिरे शैतान
डॉ. अफ़रोज़ ताज
दोहा
मानव चींटा मारकर, तनिक न देता ध्यान
मानव चींटा मारकर, तनिक न देता ध्यानचींटा उस को काट ले, आ जाये तूफ़ान
डॉ. अफ़रोज़ ताज
दोहा
कहीं फूल कहीं चादरें, कहीं पे चन्दन हार
कहीं फूल कहीं चादरें, कहीं पे चन्दन हारगंगा जी के घाट पर, मुर्दों के श्रृंगार
डॉ. अफ़रोज़ ताज
दोहा
जो भी जितना रोए है, उतना ही मुस्काए
जो भी जितना रोए है, उतना ही मुस्काएपौधा ही न सींचिए, फल कहाँ से आए
डॉ. अफ़रोज़ ताज
दोहा
शेर से डरके जानवर, भजे शहर की ओर
शेर से डरके जानवर, भजे शहर की ओरइस से तो वे वहीं भले, शहर में आदम ख़ोर
डॉ. अफ़रोज़ ताज
दोहा
पाखी बैठा पींजरा, मन ही मन में शाद
पाखी बैठा पींजरा, मन ही मन में शादसारी दुनिया जेल में, मैं ही इक आज़ाद
डॉ. अफ़रोज़ ताज
दोहा
मन में माल कुबेर का, तन से ताज मलंग
मन में माल कुबेर का, तन से ताज मलंगजैसे तेल ज़मीन में, ऊपर धूल दबंग

