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फ़ारसी सूफ़ी काव्य
लज़्ज़त अज़ हूर-ए-बहिश्त-ओ-लब-ए-हौज़श न-बुवदहर कि ऊ दामन-ए-दिलदार ख़ुद अज़ दस्त बहिश्त
हाफ़िज़
ना'त-ओ-मनक़बत
अमजद रब्बानी
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दकनी सूफ़ी काव्य
रियाजुलख़या
हैंगे इस बाब में बहुत अखबारकुछ मैं लिखता हूँ उन सते यार
मोहम्मद बाक़र आगाह
दकनी सूफ़ी काव्य
तोहफ़तुल अहबाब और तोहफ़तुल निसा
कहता था ओ दो जहाँ का मौलाटुकड़ा है मेरे ज़िगर का ज़ोहरा
मोहम्मद बाक़र आगाह
सूफ़ी उद्धरण
ओ कबीर! दरवेश की सोहबत में ख़ुदा याद आता है, यही लम्हे काम के हैं बाक़ी सब बेकार।
ओ कबीर! दरवेश की सोहबत में ख़ुदा याद आता है, यही लम्हे काम के हैं बाक़ी सब बेकार।
गुरु नानक
दोहा
साध का अंग - काम क्रोध मद लोभ नहिं खट बिकार करि हीन
काम क्रोध मद लोभ नहिं खट बिकार करि हीनपंथ कुपंथ न जानहीं ब्रह्म भाव रस लीन
दया बाई
दोहा
बैराग का अंग - छाँड़ो बिषै बिकार कूँ राम नाम चित लाव
छाँड़ो बिषै बिकार कूँ राम नाम चित लाव'दयाकुँवर' या जगत में ऐसो काल बताव
दया बाई
दोहा
अबि-बकर और उमर पुन उस्मान अ'ली बखान
अबि-बकर और उमर पुन उस्मान अ'ली बखानसत नेति और लाज अती बिद्या बूझ सुजान
बरकतुल्लाह पेमी
दकनी सूफ़ी काव्य
जंगनामा हज़रत क़ासिम
वली अपने च ग़म में सट नको होशउनके मातम के दरिया कूँ हैं बे जोश