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ना'त-ओ-मनक़बत
कुछ कुफ़्र ने फ़ित्ने फैलाए कुछ ज़ुल्म ने शो'ले भड़काएसीनों में 'अदावत जाग उठी इंसान से इंसाँ टकराए
माहिरउल क़ादरी
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ना'त-ओ-मनक़बत
अहमद रज़ा ख़ान
ना'त-ओ-मनक़बत
जो रू-ए-अहमद के मीम का ये उठा के मैं ने हिजाब देखानज़र न आया सिवा अहद के तमाशा कुछ बे-नक़ाब देखा
ग़ौसी शाह
कलाम
तू बे-पर्दा हो महफ़िल में अगर ऐ फ़ित्ना-सामानेक़ियामत तक न आएँ होश में फिर तेरे दीवाने
मंज़ूर आरफ़ी
ग़ज़ल
अमीर बख़्श साबरी
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
हिजाब-ए-चेहर:-ए-जाँ मी-शवद गु़बार-ए-तनमख़ुशा दमे कि अज़ीं चेहर: पर्द: बर-फ़िगनम
हाफ़िज़
ग़ज़ल
शाह तुराब अली क़लंदर
ग़ज़ल
हिजाब औरों को दुनिया-ए-दनी मा'लूम होती हैमुझे हर सू तिरी जल्वागरी मा'लूम होती है