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ग़ज़ल
हम उस कूचे को जज़्ब-ए-शौक़ की मंज़िल समझते हैंदर-ए-जानाँ के हर ज़र्रा को अपना दिल समझते हैं
शफ़क़ इमादपुरी
ग़ज़ल
'मज्ज़ूब' के जज़्बे की जो समझे न हक़ीक़तउन 'अक़्ल के अंधों को ये 'सौदा' नज़र आया
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
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ना'त-ओ-मनक़बत
हज़रत-ए-शब्बीर के जज़्बे ने ऐसा कर दियापरचम-ए-दीन-ए-ख़ुदा-ए-पाक ऊँचा कर दिया
नूर आलम मिस्बाही
ना'त-ओ-मनक़बत
बात ये जज़्बे की है जज़्बात की हरगिज़ नहींजज़्बा-ए-ईसार-ओ-क़ुर्बानी 'अजब ज़ैनब में है
डॉ. मंसूर फ़रीदी
ग़ज़ल
दह्र में मय-कश वफ़ादारी के जज़्बे अब कहाँइस ख़राबे में कहीं नक़्श-ए-वफ़ा मिलता नहीं
अज़मत हुसैन ख़ान
ग़ज़ल
है जब तक प्यार दुनिया में चलेगी साँस दुनिया कीमगर खो जाएँगे जब प्यार के जज़्बे तो क्या होगा
जलाल अकबर
ना'त-ओ-मनक़बत
कहाँ तक हम बयाँ कर पाएँ इस जज़्बे की सच्चाईकि जब तक लिख रहा हूँ है क़लम ज़हरा के बच्चों का