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शे'र
मोहब्बत जब हुई ग़ालिब नहीं छुपती छुपाने सेफुग़ान-ओ-आह-ओ-नाला है तिरे आ’शिक़ का नक़्क़ारा
शाह तुराब अली क़लंदर
ना'त-ओ-मनक़बत
वारिस ने मोहब्बत की जब दिल में बिना डालीफिर इ’श्क़-ए-हक़ीक़ी की वो शान दिखा डाली
सरवर शाह वारसी
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शे'र
मुज़तर ख़ैराबादी
कलाम
ऐ शो’ला-ए-जवाला जब से लौ तुझ से लगाए बैठे हैंइक आग लगी है सीने में और सब से छुपाए बैठे हैं
कामिल शत्तारी
ग़ज़ल
राज़-ए-सर-बस्ता मोहब्बत के ज़बाँ तक पहुँचेबात बढ़ कर ये ख़ुदा जाने कहाँ तक पहुँचे
हफ़ीज़ होशियारपुरी
शे'र
ऐ 'तुराब' जब गुल-बदन के दर्द सूँ गिर्यां कियादामन-ए-गुल पर मिरा हर अश्क दुर्दाना हुआ
तुराब अली दकनी
शे'र
मोहब्बत के एवज़ रहने लगे हर-दम ख़फ़ा मुझ सेकहो तो ऐसी क्या सरज़द हुई आख़िर ख़ता मुझ से
हसरत मोहानी
ग़ज़ल
मोहब्बत के एवज़ रहने लगे हर-दम ख़फ़ा मुझ सेकहो तो ऐसी क्या सरज़द हुई आख़िर ख़ता मुझ से
हसरत मोहानी
ग़ज़ल
मोहब्बत की नज़र करती है इक्सीर-ए-नज़र पैदामोहब्बत हो तो हो जाते हैं दिल पैदा जिगर पैदा

