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साखी
सतसंग का अंग - 'कबीर' मन पंछी भया भावै तहवाँ जाय
'कबीर' मन पंछी भया भावै तहवाँ जायजो जैसी संगति करै सो तैसा फल खाय
कबीर
साखी
सूक्ष्म का अंग - 'कबीर' मारग कठिन है सब मुनि बैठे थाकि
'कबीर' मारग कठिन है सब मुनि बैठे थाकितहाँ 'कबीरा' चढ़ि गया गहि सत-गुरु की साखि
कबीर
साखी
चितावनी का अंग - 'कबीर' जंत्र न बाजई टूटि गया सब तार
'कबीर' जंत्र न बाजई टूटि गया सब तारजंत्र बिचार: क्या करै चला बजावनहार
कबीर
साखी
चितावनी का अंग - 'कबीर' रसरी पाँव में कहा सोवै सुख चैन
'कबीर' रसरी पाँव में कहा सोवै सुख चैनस्वास नगाड़ा कूँच का बाजत है दिन रैन
कबीर
साखी
सतसंग का अंग - 'कबीर' संगत साध की ज्यों गंधी का बास
'कबीर' संगत साध की ज्यों गंधी का बासजो कछु गंधी दे नहीं तौ भी बास सुबास
कबीर
साखी
सतसंग का अंग - 'कबीर' संगत साध की हरै और की ब्याधि
कबीर संगत साध की हरै और की ब्याधिसंगत बुरी असाध की आठो पहर उपाधि
कबीर
साखी
पतिब्रता का अंग - 'कबीर' रेख सिंदुर अरू काजर दिया न जाय
'कबीर' रेख सिंदुर अरू काजर दिया न जायनैनन प्रीतम रमि रहा दूजा कहाँ समाय
कबीर
पद
कहै 'कबीर' विचारि कै जा कै बर्न न गाँव
कहै 'कबीर' विचारि कै जा कै बर्न न गाँवनिराकार और निर्गुना है पूरन सब ठाँव

