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न ले नूर शम'-ए-हिदायत लपक कर'कलीम' ऐसा ख़ित्ता मुनव्वर नहीं है
गीत गाऊँ तो लपक जाते हैं शो'ले दिल मेंसाज़ छेड़ूँ तो निकलता है धुआँ तारों से
लपक उस की चमक वोही दम-ख़म वही 'आलमये बिजली कोई आह-ए-आतिशीं मा’लूम होती है
जला के दिल को लपक से डरो न शो'ले कीज़बाँ-दराज़ है लेकिन नहीं फ़ुग़ाँ के लिए
लपक-झपक और आन अचानक रंग डारो और मधवा पिलायोअपने रंगीले के 'बेदम' वारी जिन मोहे लाल गुलाल बनायो
लपकلپک
grab
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