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कहीं है अ’ब्द की धुन और कहीं शोर-ए-अनल-हक़ हैकहीं इख़्फ़ा-ए-मस्ती है कहीं इज़हार-ए-मस्ती है
बेदम शाह वारसी
सलाम
सलाम उस पर जो वाली-ओ-वारिस है मोहम्मद काकिया है नाम रौशन जिस ने अपने जद्द-ए-अमजद का
अख़्तर महमूद वारसी
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
कू साबिक़-उल-ईमान बुवद रोज़-ए-नुख़ुसतींअव्वल कि सहाबी-ए-मोहम्मद 'अली-'अली
शैख़ अबु सईद सफ़वी
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सूफ़ी उद्धरण
ख़ुदा ने इंसान को "अशरफ़-उल-मख़लूकात" सबसे अच्छा प्राणी बनाया है और इसके साथ ही उस पर एक बड़ी ज़िम्मेदारी भी डाली है।
शाह अब्दुल लतीफ़ भिटाई
भजन
जो राम रत जाने नहीं बंभन हुआ तो क्या हुआ
पढ़ कर किताबें बहुत सी कहता फिरा है और कोहक़-उल-यक़ीं जाना नहीं आ'लिम हुआ तो क्या हुआ
अब्दुल समद
ना'त-ओ-मनक़बत
शम्सुज़्ज़हा मोहम्मद बदरुद्दुजा मोहम्मदनूर-उल-हुदा मोहम्मद कहफ़ुल-वरा मोहम्मद
ज़हीन शाह ताजी
भजन
हर-हर करे औ गुर को देखे उस को मिलता प्यारा है
अलख लखे औ सब को मेटे उस ने ग्यान सवारा हैपट भीतर के चित से खोले फिर क्या साहब न्यारा है
अब्दुल समद
भजन
साधो क्यूँ तूँ रब का नाम बिसारे
साधो क्यूँ तूँ रब का नाम बिसारेरब के बिसारे से ऐन बाजी हारे
अब्दुल समद
ना'त-ओ-मनक़बत
'आशिक़ों का कुल सर-ओ-सामाँ मोहम्मद मुस्तफ़ादीं मोहम्मद मुस्तफ़ा ईमाँ मोहम्मद मुस्तफ़ा
बहज़ाद लखनवी
बैत
हैराँ हूँ मैं उस शख़्स पे जिस ने ये न जाना
हैराँ हूँ मैं उस शख़्स पे जिस ने ये न जानाअव्वल भी है अफ़ज़ल भी मोहम्मद का घराना
मोहम्मद समी
फ़ारसी कलाम
मर्हबा सय्यद-ए-मक्की मदनी-उल-'अरबीदिल-ओ-जाँ बाद-ए-फ़िदायत चे 'अजब ख़ुश-लक़बी