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ग़ज़ल
क्या फ़र्क़ दाग़-ओ-गुल में अगर गुल में बू न होकिस काम का वो दिल है कि जिस दिल में तू न हो
ख़्वाजा मीर दर्द
फ़ारसी सूफ़ी काव्य
ऐ बाद-ए-मुश्क-बू ब-गुज़र सू-ए-आँ-निगारब-कुशा गिरह ज़े-ज़ुल्फ़श व बू-ए-ब-मन बयार
हाफ़िज़
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शे'र
मिस्ल-ए-गुल बाहर गया गुलशन से जब वो गुल-एज़ारअश्क-ए-ख़ूनी से मेरा तन तर-ब-तर होने लगा
किशन सिंह आरिफ़
शे'र
मिस्ल-ए-गुल बाहर गया गुलशन से जब वो गुल-ए'ज़ारअश्क-ए-ख़ूनी से मेरा तन तर-ब-तर होने लगा
किशन सिंह आरिफ़
शे'र
बुलबुल सिफ़त ऐ गुल-बदन इस बाग़ में हर सुब्हतेरी बहारिस्तान का दीवाना हूँ दीवाना हूँ
क़ादिर बख़्श बेदिल
ग़ज़ल
चराग़-ए-जहाँ में ऐ गुल जो कुछ कि है सो तू हैशम्साद-ओ-सर्व-ए-सुंबुल जो कुछ कि है सो तू है





