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ना'त-ओ-मनक़बत
अब भी ज़ुल्मात फ़रोशों को गिला है तुझ सेरात बाक़ी थी कि सूरज निकल आया तेरा
अहमद नदीम क़ासमी
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कलाम
घनी शाख़ों में छुप कर जब कोई चिड़िया चहकती हैतो मेरे दिल में क्यूँ हसरत की चिंगारी भड़कती है
अहमद नदीम क़ासमी
ग़ज़ल
दिल में उतरते हर्फ़ से मुझ का मिला पता तिरामो’जज़ा-ए-हुस्न-ए-सौत का ज़म्ज़मा-ए-सदा तिरा
अहमद नदीम क़ासमी
ना'त-ओ-मनक़बत
क़तरा माँगे जो कोई तो उसे दरिया दे देमुझ को कुछ और न दे अपनी तमन्ना दे दे
अहमद नदीम क़ासमी
ना'त-ओ-मनक़बत
अहमद नदीम क़ासमी
ना'त-ओ-मनक़बत
रूह-ओ-बदन में क़ौल-ओ-'अमल में कितने जमील हैं आपइंसाँ है मस्जूद-ए-मलाइक इस की दलील हैं आप
अहमद नदीम क़ासमी
ना'त-ओ-मनक़बत
मुझ को तो अपनी जाँ से भी प्यारा है उन का नामशब है अगर हयात सितारा है उन का नाम