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मूजिद-ए-क़व्वाली हज़रत अमीर ख़ुसरो की तमाम-तर ईजादात-ओ-तस्नीफ़ात का मुताल’आ हमें इस नतीजा पर पहुँचाता है कि
नहाय धोय सेज मेरी आयोले चूमा मुँह मुँह हि लगायो
उठा दोनों टाँगन बीच डालानाप-तोल में देखा-भाला
नंगे पाँव फिरन नहिं देतपाँव से मिट्टी लगन नहिं देत
द्वारे मोरे अलख जगावेभभूत विरह के अंग लगावे
सारी रैन मोरे संग जागाभोर भए तब बिछुड़न लागा
रैन पड़े जब घर में आवेवा का आना मोको भावे
जब माँगूँ तब जल भर लावैमेरे तन की तपन बुझावे
अंगों मेरे लिपटा आवेवा का खेल मोरे मन भावे
बरसा-बरस वो देख में आवेमुँह से मुँह लगा रस पियावे
बेर बेर सोवत ही जगावेना जागूँ तो काटे खावे
रात समय वो मेरे आवेभोर भए घर से उठ जावे
पड़ी थी मैं अचानक चढ़ आयोजब उतरयो तो पसीनो आओ
जब मोरे मंदिर में आवैसोते मुझ को आनि जगावे
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