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कभी ख़ंजर को कभी अहल-ए-वफ़ा को देखाआज क़ातिल तेरे कूचे की हवा को देखा
अल्लाह की मर्ज़ी पे फ़िदा कौन हुआ हैतब्लीग़ रिसालत की ज़िया कौन बना है
'इश्क़ का ख़ंजर रग-ए-जाँ पर लगा रोज़-ए-अज़लएक क़तरा ख़ून का उस से टपक कर दिल बना
ख़ंजर लगा तू क़ातिल तेवरी बदल-बदल करअरमान ताकि निकलें दिल से मचल-मचल कर
दिल ख़ूँ न-शुदे चश्म-ए-तू ख़ंजर न-शुदे गररह गुम न-शुदे ज़ुल्फ़-ए-तू अबतर न-शुदे गर
खिल जाता है क्यूँ ग़ुंचा-सिफ़त दिल तह-ए-ख़ंजरटूटे हैं मज़े दीद के क़ातिल तह-ए-ख़ंजर
ख़ंजर कैसा फ़क़त अदा सेतड़पा तड़पा के मार डाला
हैं ख़जिल क़ौस-ओ-हिलाल-ओ-ख़ंजर-ओ-तेग़-ए-सितमक़ातिल-ए-आ’लम है तेरी अबरु-ए-पुर-ख़म नहीं
दिल बुतों पर फ़िदा किया मैं नेबार इलाहा ये क्या किया में नय
न तरसा उन्हें आब-ए-ख़ंजर को क़ातिलदु’आएँ तुझे देंगे बिस्मिल हज़ारों
इस तरह गर्दन पे ख़ंजर को लगाते जाइएख़ूँ से आलूदः न हो दामन बचाते जाइए
तेग़-ओ-ख़ंजर से ज़्यादा वो असर रखते हैंक़त्ल करने का जो आँखों में हुनर रखते हैं
दिल ख़ंजर उतारता कैसेतेरी यादों को मारता कैसे
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