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साखी
पतिब्रता का अंग - प्रीति अड़ी है तुज्झ से बहु गुनियाला कंत
प्रीति अड़ी है तुज्झ से बहु बहु कंतजो हँस बोलौं और से नील रँगाओं दंत
कबीर
शबद
होली - सखी री खेलहु प्रीति लगाय
सखी री खेलहु प्रीति लगायहै सुचित्त चित्त काँ थिर करि दीजै सब बिसराय
जगजीवन साहेब
दोहा
वहै प्रीति नहिं रीति वह नहीं पाछिलो हेत
वहै प्रीति नहिं रीति वह नहीं पाछिलो हेतघटत घटत रहिमन घटै ज्यो कर लीन्हें रेत
रहीम
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गूजरी सूफ़ी काव्य
'बाजन' प्रिती दरवेश की जिस देवे कर्तार
'बाजन' प्रिती दरवेश की जिस देवे कर्तारइस जग मियाने राज करे उस जग उतरे पार
शैख़ बहाउद्दीन बाजन
सोरठा
'रहिमन' कीन्हीं प्रीति साहब को भावै नहीं
'रहिमन' कीन्हीं प्रीति साहब को भावै नहींजिनके अगनित मीत महैं गरीबन को गनै
रहीम
पद
मोरी प्रभु पग लागी प्रीति
मोरी प्रभु पग लागी प्रीतिजप तप दान मनहि नहिं भावत जात निषिल्द बिहीत
गुलाब राय महाराज
शबद
उपदेश का अंग - मनुआँ साँची प्रीति लगाव
मनुआँ साँची प्रीति लगावएकहिं तेंनी सदा राखु चित दुबिधा नहिं लै आव
जगजीवन साहेब
दोहा
रहिमन प्रीति सराहिए मिले होत रँग दून
रहिमन प्रीति सराहिए मिले होत रँग दूनज्यों जरदी हरदी तजै तजै सफ़ेदी चून
रहीम
दोहा
'रहिमन' प्रीति न कीजिए जस खीरा ने कीन
'रहिमन' प्रीति न कीजिए जस खीरा ने कीनऊपर से तो दिल मिला भीतर फाँकें तीन
रहीम
अरिल्ल
अरिल छंद - खुब साहब सों प्रीति सुरति जो लावई
खुब साहब सों प्रीति सुरति जो लावईअलह इमान सों नूर कसब तब पावई
गुलाल साहब
छंद
बुरो प्रीति को पंथ बुरो जंगल को बासो
बुरो प्रीति को पंथ बुरो जंगल को बासोबुरो नारि को नेह बुरो मूरख सों हासो
गंग
साखी
प्रेम का अंग - उत्तम प्रीति सो जानिये सतगुरु से जो होय
उत्तम प्रीति सो जानिये सतगुरु से जो होयगुनवंता औ द्रब्य की प्रीति करै सब कोय
कबीर
दोहा
रहिमन नीच प्रसंग ते नित प्रति लाभ विकार
रहिमन नीच प्रसंग ते नित प्रति लाभ विकारनीर चोरावै संपुटी मारु सहै घरिआर
रहीम
दोहा
रहिमन ओछे नरन सों बैर भलो ना प्रीति
'रहिमन' ओछे नरन सों बैर भलो ना प्रीतिकाटे चाटै स्वान के दोऊ भाँति विपरीति
रहीम
शबद
उपदेश प्रीति उसी से कीजिए जो ओर निभावै
प्रीति उसी से कीजिए जो ओर निभावैबिना प्रीति के मानवा कहि ठौर पावै
कबीर
दोहा
सरवर के खग एक से बाढत प्रीति न धीम
सरवर के खग एक से बाढत प्रीति न धीमपै मराल को मानसर एकै ठौर 'रहीम'