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फ़ारसी सूफ़ी काव्य
दोश चश्म-ए-जानम अज़ दीदार-ए-शह पुर-नूर बूदमुतरिब-ए-मा ज़ोहरः-ओ-साक़ी-ए-मजलिस हूर बूद
हुसैन बिन मंसूर हल्लाज
ग़ज़ल
नहीं पुर-अश्क ये आँखें ख़याल-ए-ज़ुल्फ़-ए-क़ातिल मेंबड़ी मुश्किल से दो दरिया को जकड़ा है सलासिल में
अर्श गयावी
ग़ज़ल
ज़ाहिद तू पेच-ए-ज़ुल्फ़-ए-दोता में न जा न जाऐ बे-ख़बर तूँ दाम-ए-बला में न जा न जा
क़ादिर बख़्श बेदिल
शे'र
तेरे नैन-ए-पुर-ख़ुमार कूँ सरमस्त-ए-बादा-नाज़या बे-ख़ुदी का जाम या सहर-ए-बला कहूँ
क़ादिर बख़्श बेदिल
शबद
उपदेश का अंग - अगम पुर नौंबति धुनि जंह बाजई
अगम पुर नौंबति धुनि जंह बाजईघन गरजै मोती तहं बरसै उलट गगन चढ़ि गाजई
गुलाल साहब
कलाम
मिरी ज़ीस्त पुर-मसर्रत कभी थी न है न होगीकोई बेहतरी की सूरत कभी थी न है न होगी





