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कलाम
हमें क्या ग़म क़ियामत में जो पुर्सिश होने वाली हैकि जब वो फ़ित्ना-गर आया तो फिर मैदान ख़ाली है
दाग़ देहलवी
ना'त-ओ-मनक़बत
कहों क्या हाल ज़ाहिद वादी-ए-तैबा की नुज़हत काकि है ख़ुल्द-ए-बरीं छोटा सा टुकड़ा मेरी जन्नत का
हसन रज़ा बरेलवी
शे'र
जाते जाते अर्सा-ए-गाह-ए-हश्र तक जो हाल होउठते उठते क़ब्र में सौ फ़ित्ना-ए-महशर उठे
रियाज़ ख़ैराबादी
शे'र
मुज़तर ख़ैराबादी
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दोहा
देख मैं अपने हाल को रोऊँ ज़ार-ओ-ज़ार
देख मैं अपने हाल को रोऊँ ज़ार-ओ-ज़ारवै गुनवंता बहुत हैं हम हैं अवगुण-हार
अमीर ख़ुसरौ
कलाम
नहीं आश्ना मिरे हाल से कोई आँख बज़्म-ए-मजाज़ मेंहूँ वो आईन: जो है ना-तमाम अभी ज़ेहन-ए-आईनः-साज़ में
सीमाब अकबराबादी
पद
हाल से आशिक़ के वाइ'ज़ को कब 'दिलदार' ख़बर है
हाल से आशिक़ के वाइ'ज़ को कब दिलदार ख़बर हैकर देवें गर चाहें यक नाले में शक़्क़-ए-क़मर है
कवि दिलदार
दोहा
सज्जन हित कंचन-कलश तोरी निहारिय हाल
सज्जन हित कंचन-कलश तोरी निहारिय हालदुर्जन हित कुमार-घट बिनसिन जुरै 'जमाल'
जमाल
कृष्ण भक्ति सूफ़ी कलाम
तीर-ए-नज़र वो दिल पे खाए मन का हाल न पूछो हायनस नस में इक आग लगी है प्रेम की अग्नी कौन बुझाए