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शे'र
मिरा सर कट के मक़्तल में गिरे क़ातिल के क़दमों परदम-ए-आख़िर अदा यूँ सज्दा-ए-शुकराना हो जाए
बेदम शाह वारसी
शे'र
क्या कहूँ क्या ला-मकाँ में उ’म्र 'मुज़्तर' काट दीबे-ख़ुदी ने जिस जगह रखा वहाँ रहना पड़ा
मुज़तर ख़ैराबादी
पद
विरह के पद - हो जी हरि कित गए नेह लगाए
हो जी हरि कित गए नेह लगाएनेह लगाए मेरे मन हर ली-यो रस भरी टेर सुनाए
मीराबाई
कलाम
पंजे-महल पंजाँ विच चानण डीवा कित वल धरिये हूपंजे महर पंजे पटवारी हासल कित वल भरिये हू
सुल्तान बाहू
ग़ज़ल
ये मुक़द्दर का लिखा है अब ये कट सकता नहींराह से उन की हमारा पाँव जिसे हट सकता नहीं
पीर नसीरुद्दीन नसीर
दोहा
नर राची मेंना लखी तू कित लिख्यो सुजान
नर राची मेंना लखी तू कित लिख्यो सुजानपढ़ कुरान भौरा भयो सुन राच्यो ‘रहमान’
अब्दुर्रहमान
राग आधारित पद
राग धनाश्री - हरि कत भये ब्रज के चोर
हरि कत भये ब्रज के चोरतुम्हरे मधुप वियोग राधे मदन के झकझोर
सूरदास
साखी
सूक्ष्म का अंग - नाँव न जानै गाँव का बिन जाने कित जाँव
नाँव न जानै गाँव का बिन जाने कित जाँवचलते चलते जुग भया पाव कोस पर गाँव
कबीर
बैत
आए वो आए रात उसी धुन में कट गई
आए वो आए रात उसी धुन में कट गईएहसास तक हुआ न हमें इंतिज़ार का
