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सलोक
माया- माया भुलाया, भवनि जीअ भर्म मे।
माया भुलाया, भवनि जीअ भर्म मे।मने वेठो पाण खे, कल्पत जी काया।
सामी
सलोक
अज्ञान- अठई पहर वञनि, था भुली जीअ भर्म मे।
अठई पहर वञनि, था भुली जीअ भर्म मे।पुठी देई पाणखे, था नाना दुख सहनि।
सामी
सलोक
माया- माया मूहु कारो, केरे मोहियो माणुहुनि खे।
माया मूहु कारो, केरे मोहियो माणुहुनि खे।पाए भवनि था पाणही, गिचीअ मेगारो।
सामी
सलोक
अज्ञान- अणहून्दे ओले, सामी लिको सुप्री।
अणहून्दे ओले, सामी लिको सुप्री।लधो सगि साधूअ जे, फकीरनि फोले।
सामी
सलोक
माया- माया करे मकरु, मोहे मारे सभखे।
माया करे मकरु, मोहे मारे सभखे।रहे अलेपु आकास जॉ, को निरासो निदरु।
सामी
सलोक
अज्ञान- अन्धा उपाधी, सचु सुञाणनि कीनकी।
अन्धा उपाधी, सचु सुञाणनि कीनकी।देही जाणी पाणखे, रोई खणनि राधी।
सामी
सलोक
अज्ञान- अणहून्दो भोलु भर्म, मूर्ख मन्यो मति रे।
अणहून्दो भोलु भर्म, मूर्ख मन्यो मति रे।न कहि जोरु जुल्मु कयो, न कँहि लज शर्मु।
सामी
सलोक
अज्ञान- अणहून्दो भोलो, पियो मालिक जे मन मे।
अणहून्दो भोलो, पियो मालिक जे मन मे।सामी शाहु स्वप्न जो, थियो गोलनि जो गोलो।
सामी
सलोक
अज्ञान- अणहून्दे अज्ञान, रची रादि रग भरी।
अणहून्दे अज्ञान, रची रादि रग भरी।सति जाणी सामी चए, नृति कनि नादान।
सामी
सलोक
अज्ञान- अणहून्दे ठग ठगे, कोडे विधा केतिरा।
अणहून्दे ठग ठगे, कोडे विधा केतिरा।जीए पाछाओ पँहिजो, थी भारी भूतु लगे।
सामी
सलोक
माया- माया मचायो, कूडो खेलु कल्पत जो।
माया मचायो, कूडो खेलु कल्पत जो।तहिंमे कनि तद्रूपु थी, मूर्ख मनु भायो।
सामी
सलोक
अज्ञान- अणहून्दे ओले, सामी लिको सुप्री।
अणहून्दे ओले, सामी लिको सुप्री।लधो सिक सचीअ सॉ, फकीरनि फोले।
सामी
सलोक
अज्ञान- अन्धा अति अनीति, भुली कनि भर्म मे।
अन्धा अति अनीति, भुली कनि भर्म मे।पुठी देई पाणखे, भोगिनि था भयभीति।





