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सेहरा
तुर्रा-ए-पुर-पेच और अमामः बधी मेहदी कंगना ग़ाज़ादूल्हा है मुरस्सा सर-ता-पा ऐसा ही उस का सेहरा है
बेदम शाह वारसी
कलाम
भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे क़ामत की दराज़ी काअगर इस तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-ख़म का पेच-ओ-ख़म निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
कलाम
ऐ दिल-ए-पुर-सुरूर-ए-मन नाज़ न बन नियाज़ बनसाक़ी-ए-मस्त-ए-नाज़ की आँखों में सरफ़राज़ बन
शाह मोहसिन दानापुरी
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फ़ारसी सूफ़ी काव्य
दोश चश्म-ए-जानम अज़ दीदार-ए-शह पुर-नूर बूदमुतरिब-ए-मा ज़ोहरः-ओ-साक़ी-ए-मजलिस हूर बूद
हुसैन बिन मंसूर हल्लाज
ग़ज़ल
नहीं पुर-अश्क ये आँखें ख़याल-ए-ज़ुल्फ़-ए-क़ातिल मेंबड़ी मुश्किल से दो दरिया को जकड़ा है सलासिल में
अर्श गयावी
ग़ज़ल
ज़ाहिद तू पेच-ए-ज़ुल्फ़-ए-दोता में न जा न जाऐ बे-ख़बर तूँ दाम-ए-बला में न जा न जा
क़ादिर बख़्श बेदिल
शे'र
तेरे नैन-ए-पुर-ख़ुमार कूँ सरमस्त-ए-बादा-नाज़या बे-ख़ुदी का जाम या सहर-ए-बला कहूँ





