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ना'त-ओ-मनक़बत
जिस रंग में ऐ यार मुझे तू नज़र आयाऐसा कोई गुल भी नहीं ख़ुश-रू नज़र आया
अब्दुल रहीम कुंजपूरी
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ना'त-ओ-मनक़बत
वस्ल इक हक़ीक़त थी हिज्र इक फ़साना थाहम थे जब मदीना में वो भी क्या ज़माना था
शाह अब्दुल क़दीर बदायूँनी
सूफ़ी कहावत
ख़लवत अज़ अग़्यार बायद ने ज़े यार
अजनबियों से अलग रहना चाहिए, दोस्तों से नहीं।
वाचिक परंपरा
शे'र
नौ-असीर-ए-फ़ुर्क़त हूँ वस्ल-ए-यार मुझ से पूछहो गई ख़िज़ाँ दम में सब बहार मुझ से पूछ
निसार अकबराबादी
शे'र
नौ-असीर-ए-फ़ुर्क़त हूँ वस्ल-ए-यार मुझ से पूछहो गई ख़िज़ाँ दम में सब बहार मुझ से पूछ
निसार अकबराबादी
ग़ज़ल
नौ-असीर-ए-फ़ुर्क़त हूँ वस्ल-ए-यार मुझ से पूछहो गई ख़िज़ाँ दम में सब बहार मुझ से पूछ
निसार अकबराबादी
ना'त-ओ-मनक़बत
क्या ही सूरत है मिरी यार की अल्लाह अल्लाहमेरी सूरत मिरी दिलदार की अल्लाह अल्लाह



