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शे'र
सितमगर तुझ से उम्मीद-ए-करम होगी जिन्हें होगीहमें तो देखना ये था कि तू ज़ालिम कहाँ तक है
बेदम शाह वारसी
शे'र
वफ़ा की हो किसी को तुझ से क्या उम्मीद ओ ज़ालिमकि इक आलम है कुश्त: तेरी तर्ज़-ए-बेवफ़ाई का
इब्राहीम आजिज़
शे'र
तुझ से मिलने का बता फिर कौन सा दिन आएगाई’द को भी मुझ से गर ऐ मेरी जाँ मिलता नहीं