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चाँद सा मुखड़ा उस ने दिखा कर फिर नैनाँ के बाण चला करसँवरिया ने बीच-बजरिया लूट लियो इस निर्धन को
अब्दुल हादी काविश
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ख़ुद तुम्हें ये चाँद-सा मुखड़ा करेगा बे-हिजाबमुँह पे जब मारोगे तुम झुरमुट कताँ हो जाएगा
क़द्र बिलग्रामी
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‘अयाज़’ इक बेश-क़ीमत सा तुझे नुक्ता बताता हूँतुम अपने आपको समझो ख़ुदा क्या है ख़ुदा जाने
बेख़ुद सुहरावर्दी
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वो चाँद सा मुँह सुर्ख़ दुपट्टा में है रख़्शाँया मेहर कहूँ जल्वा-नुमा ज़ेर-ए-शफ़क़ है
मीर मोहम्मद बेदार
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तुझ से मिलने का बता फिर कौन सा दिन आएगाई’द को भी मुझ से गर ऐ मेरी जाँ मिलता नहीं
अकबर वारसी मेरठी
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कहाँ मुमकिन है किस से इंतिज़ार-ए-यार हो मुझ सारहेगी फिर भी यूँही मिस्ल-ए-नर्गिस आँख वा किस की
आसी गाज़ीपुरी
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चाँद सा मुखड़ा उस ने दिखा कर फिर नैनाँ के बाँड़ चला करसाँवरिया ने बीच-बजरिया लूट लियो इस निर्धन को
अब्दुल हादी काविश
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बेदम शाह वारसी
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नौ ख़त तो हज़ारों हैं गुलिस्तान-ए-जहाँ मेंहै साफ़ तो यूँ तुझ सा नुमूदार कहाँ है
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
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तुम आए रौशनी फैली हुआ दिन खुल गईं आँखेंअँधेरा सा अँधेरा छा रहा था बज़्म-ए-इम्काँ में
हसन रज़ा बरेलवी
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जल्वा-ए-हर-रोज़ जो हर सुब्ह की क़िस्मत में थाअब वो इक धुँदला सा ख़्वाब-ए-दोश है तेरे बग़ैर
सीमाब अकबराबादी
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तू ने अपना जल्वा दिखाने को जो नक़ाब मुँह से उठा दियावहीं हैरत-ए-बे-खु़दी ने मुझे आईना सा दिखा दिया
शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
शे'र
तू ने अपना जल्वा दिखाने को जो नक़ाब मुँह से उठा दियावहीं हैरत-ए-बे-खु़दी ने मुझे आईना सा दिखा दिया