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साग़र शराब-ए-इ'श्क़ का पी ही लिया जो हो सो होसर अब कटे या घर लुटे फ़िक्र ही क्या जो हो सो हो
अब्दुल हादी काविश
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इ’श्क़ में तेरे कोह-ए-ग़म सर पे लिया जो हो सो होऐ’श-ओ-निशात-ए-ज़िंदगी छोड़ दिया जो हो सो हो
शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
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इ'श्क़ में तेरे कोह-ए-ग़म सर पे लिया जो हो सो होऐश-ओ-निशात-ए-ज़िंदगी छोड़ दिया जो हो सो हो
शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
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अदा ग़म्ज़े करिश्मे इश्वे हैं बिखरे हुए हर-सूसफ़-ए-मक़्तल में या क़ातिल है या अंदाज़-ए-क़ातिल है
अकबर वारसी मेरठी
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अदा ग़म्ज़े करिश्मे इश्वे हैं बिखरे हुए हर-सूसफ़-ए-मक़्तल में या क़ातिल है या अंदाज़-ए-क़ातिल है
अकबर वारसी मेरठी
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इतनी बात न बूझी लोगाँ आप निभाता करी सो कुएइ’ल्म क़ुदरत जिस थोरा होवे की मजबूर विचारा होए
शाह अली जीव गामधनी
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जब तक एक हसीं मकीं था दिल में हर-सू फूल खिले थेवो उजड़ा तो गुलशन उजड़ा और हुआ आबाद नहीं है