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शे'र
बना कर कुफ़्र को आईना सूरत देख ईमाँ कीसनम की शक्ल में जल्वा-कुनाँ अल्लाह ही अल्लाह है
वतन हैदराबादी
शे'र
वक़्त-ए-आराईश जो की आईना पर उसने नज़रहुस्न ख़ुद कहने लगा इस से हसीं देखा नहीं
मिरर्ज़ा फ़िदा अली शाह मनन
शे'र
तुम्हारे दर पे आया ‘आफ़ताब’ उसकी जो मुश्किल हैकरो जल्दी से आसां, हज़रत-ए-ख़्वाजा मुईनुद्दीं
शाह आलम सानी
शे'र
फ़स्ल-ए-गुल आई या अजल आई क्यों दर-ए-ज़िंदाँ खुलता हैया कोई वहशी और आ पहुंचा या कोई क़ैदी छूट गया