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शे'र
कूचे में तिरे ऐ जान-ए-ग़ज़ल ये राज़ खुला हम पर आ करग़म भी तो इनायत है तेरी हम ग़म का मुदावा भूल गए
अब्दुल हादी काविश
शे'र
तिरे कूचे में क्यूँ बैठे फ़क़त इस वास्ते बैठेकि जब उट्ठेंगे इस दुनिया से जन्नत ले के उट्ठेंगे
मुज़्तर ख़ैराबादी
शे'र
बाग़-ओ-बहिश्त-ओ-हूर-ओ-जन्नत अबरारों को कीजिए इनायतहमें नहीं कुछ उस की ज़रूरत आप के हम दीवाने हैं
निसार अकबराबादी
शे'र
जिगर मुरादाबादी
शे'र
ऐ’श-ओ-इश्रत वस्ल-ओ-राहत सब ख़ुशी में हैं शरीकबे-कसी में आह कोई पूछने वाला नहीं
मिरर्ज़ा फ़िदा अली शाह मनन
शे'र
साज़-ओ-सामाँ हैं मेरी ये बे सर-ओ-सामनियाँबाग़-ए-जन्नत से भी अच्छा है ये वीराना मिरा
कैफ़ी हैदराबादी
शे'र
वफ़ा की हो किसी को तुझ से क्या उम्मीद ओ ज़ालिमकि इक आलम है कुश्त: तेरी तर्ज़-ए-बेवफ़ाई का