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शे'र
निकल कर ज़ुल्फ़ से पहुँचूँगा क्यूँकर मुसहफ़-ए-रुख़ परअकेला हूँ अँधेरी रात है और दूर मंज़िल है
अकबर वारसी मेरठी
शे'र
अज़ीज़ सफ़ीपुरी
शे'र
मुजस्सम सूरत-ए-ग़म हूँ सरापा हसरत-ए-दिल हूँन मैं ज़िंदों में दाख़िल हूँ न मैं मुर्दों में शामिल हूँ
कौसर ख़ैराबादी
शे'र
बना कर कुफ़्र को आईना सूरत देख ईमाँ कीसनम की शक्ल में जल्वा-कुनाँ अल्लाह ही अल्लाह है
वतन हैदराबादी
शे'र
रुख़ पे हर सूरत से रखना गुल-रुख़ाँ ख़त का है कुफ़्रदेखो क़ुरआँ पर न रखियो बोस्ताँ बहर-ए-ख़ुदा
शाह नसीर
शे'र
रुख़ पे हर सूरत से रखना गुल-रुख़ाँ ख़त का है कुफ़्रदेखो क़ुरआँ पर न रखियो बोस्ताँ बहर-ए-ख़ुदा
शाह नसीर
शे'र
वफ़ादारी की सूरत में जफ़ा-कारी का नक़्शा तूये नैरंग-ए-मोहब्बत है कि ऐसा मैं हूँ वैसा तू
मुज़तर ख़ैराबादी
शे'र
वो ऐ 'सीमाब' क्यूँ सर-ग़श्तः-ए-तसनीम-ओ-जन्नत होमयस्सर जिस को सैर-ए-ताज और जमुना का साहिल है