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शे'र
ये आ’लम है ‘रियाज़’ एक एक क़तरा को तरसता हूँहरम में अब ख़ुदा जाने भरी बोतल कहाँ रख दी
रियाज़ ख़ैराबादी
शे'र
कुछ इस आ'लम में वो बे-पर्दा निकले सैर-ए-गुलशन कोकि नसरीं अपनी ख़ुश्बू रंग भोली नस्तरन अपना
हसरत मोहानी
शे'र
पढ़ पढ़ इ’ल्म हज़ार कताबाँ आ’लिम होए भारे हूहर्फ़ इक इ’श्क़ दा पढ़ न जाणन भुल्ले फिरन विचारे हू
सुल्तान बाहू
शे'र
तुम्हारे दर पे आया ‘आफ़ताब’ उसकी जो मुश्किल हैकरो जल्दी से आसां, हज़रत-ए-ख़्वाजा मुईनुद्दीं
शाह आलम सानी
शे'र
हिज्र के आलाम से छूटूं ये क़िस्मत में नहींमौत भी आने का गर वा’दा करे बावर ना हो