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शे'र
तुम आए रौशनी फैली हुआ दिन खुल गईं आँखेंअँधेरा सा अँधेरा छा रहा था बज़्म-ए-इम्काँ में
हसन रज़ा बरेलवी
शे'र
क्या इन आहों से शब-ए-ग़म मुख़्तसर हो जाए गीये सह सेहर होने की बातें हैं सेहर हो जाए गी
क़मर जलालवी
शे'र
हुकूमत के मज़ालिम जब से इन आँखों ने देखे हैंजिगर हम बम्बई को कूचा-ए-क़ातिल समझते हैं
जिगर मुरादाबादी
शे'र
जानता हूँ मैं कि मुझ से हो गया है कुछ गुनाहदिलरुबा या बे-दिलों से दिल तुम्हारा फिर गया