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शे'र
ख़ुद-साज़ी में मसरूफ़-ए-ख़ुदाई है 'सुलैमाँ'दुनिया में कोई मर्द-ए-ख़ुदा-साज़ कहाँ है
सुलैमान वारसी
शे'र
गया फ़ुर्क़त का रोना साथ उम्मीद-ओ-तमन्ना केवो बेताबी है अगली सी न चश्म-ए-ख़ूँ-चकाँ मेरी
राक़िम देहलवी
शे'र
बेशक ख़ुदा बने जो ‘फ़ना’ तोड़े अब्दियतख़ुद-बीनियों का अपनी जो पाया शिकस्त हो
सुलेमान शिकोह गार्डनर
शे'र
क्या ग़म जो टूट जाएँ जिगर, जाँ, कलेजा, दिलपर तेरी चाह की न तमन्ना शिकस्त हो
सुलेमान शिकोह गार्डनर
शे'र
तुम को कहते हैं कि आशिक़ की फ़ुग़ाँ सुनते होये तो कहने ही की बातें हैं कहाँ सुनते हो
मीर मोहम्मद बेदार
शे'र
सुकून-ए-क़ल्ब की उम्मीद अब क्या हो कि रहती हैतमन्ना की दो-चार इक हर घड़ी बर्क़-ए-बला मुझ से
हसरत मोहानी
शे'र
तू उसी की आँख का नूर है तू उसी के दिल का सुरूर हैकि जिसे बुलंद नज़र मिली कि जिसे शुऊ'र-ए-विला मिला