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शे'र
हिज्र की जो मुसीबतें अ’र्ज़ कीं उस के सामनेनाज़-ओ-अदा से मुस्कुरा कहने लगा जो हो सो हो
शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
शे'र
वो उ’रूज-ए-माह वो चाँदनी वो ख़मोश रात वो बे-ख़ुदीवो तसव्वुरात की सरख़ुशी तिरे साथ राज़-ओ-नियाज़ में
सीमाब अकबराबादी
शे'र
ग़ैर मुँह तकता रहा मैं अर्ज़-ए-मतलब कर चुकामुझ से उन से आँखों आँखों में इशारः हो गया
संजर ग़ाज़ीपुरी
शे'र
मेरे अ'र्ज़-ए-ग़म पे वो कहना किसी का हाए हाएशिकवा-ए-ग़म शेवा-ए-अहल-ए-वफ़ा होता नहीं