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शे'र
हम तो ’आशिक़ हैं तेरे सूरज पे जूँ सूरज-मुखीहो जिधर तू बस उधर ही मुँह हमारा फिर गया
किशन सिंह आरिफ़
शे'र
बेदम शाह वारसी
शे'र
अज़्म-ओ-इस्तिक़लाल है शर्त-ए-मुक़द्दम 'इश्क़ मेंकोई जादा क्यूँ न हो इंसान उस पर जम रहे
कामिल शत्तारी
शे'र
हुस्न महव-ए-रंग-ओ-बू है 'इश्क़ ग़र्क़-ए-हाय-ओ-हूहर गुलिस्ताँ उस तरफ़ है हर बयाबाँ इस तरफ़
ज़हीन शाह ताजी
शे'र
हैं शौक़-ए-ज़ब्ह में आशिक़ तड़पते मुर्ग़-ए-बिस्मिल सेअजल तो है ज़रा कह आना ये पैग़ाम क़ातिल से
शाह अकबर दानापूरी
शे'र
'इश्क़ की आईना-दारी जज़्बा-ए-कामिल में हैवो मिरे दिल में है पहले से जो उन के दिल में है
निहाद सण्डेलवी
शे'र
लैल-ओ-नहार चाहे अगर ख़ूब गुज़रे 'इ'श्क़'कर विर्द उस के नाम को तू सुब्ह-ओ-शाम का
ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़
शे'र
आ’शिक़ इ’श्क़ माही दे कोलों फिरन हमेशा खीवे हूजींदे जान माही नूँ डित्ती दोहीं जहानीं जीवे हू
सुल्तान बाहू
शे'र
पहुँचा है जब से 'इश्क़ का मुझ को सलाम-ए-ख़ासदिल के नगीं पे तब से खुदाया है नाम-ए-ख़ास