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जो मरने से मूए पहले उन्हें क्या ख़ौफ़ दोज़ख़ कादिल अपना नार-ए-हिजरत से जला ले जिस का जी चाहे
अगर एक पल हो जुदाई तेरीतो सहरा मुझे सारा घर-बार हो
है क्या ख़ौफ़ 'आरिफ़' को महशर के दिनवकालत पे जब पीर मुख़्तार हो
मिल गया है दिल किसी दीदार सेहो गया बेज़ार अब घर-बार से
मेरा बख़्त-ए-ख़्वाबीदा बेदार होतेरा ख़्वाब में मुझ को दीदार हो
कूचा-ए-जानाँ में जाना है मुहालख़ौफ़ है उस संग-दिल खूँ-ख़्वार से
दिखा मुझ को दीदार ऐ गुल-एज़ारतुझे अपने बाग़-ए-इरम की क़सम
बराबर हैं गर पास हो गुल-बदनचमन हो कि जंगल चे गुलज़ार हो
मैं हूँ बेचता धर्म-ओ-ईमान-ओ-दींंअगर कोई आ कर ख़रीदार हो
साहब-ए-तौहीद को तलवार की हाजत नहींज़ख़्मी-ए-मिज़्गाँ को कुछ सोफ़ार की हाजत नहीं
ऐ सितमगर बेवफ़ा ये बेवफ़ाई कब तलकआशिक़ों की तेरे कूचे में दुहाई कब तलक
न छुप मुझ से तू ऐ बुत-ए-संग-दिलतुझे इस किताब और क़लम की क़सम
जब दुई दिल से गई और दिलरुबा देखा अ'याँडाल कर गुल को गले में ख़ार की हाजत नहीं
मय से चुल्लू भर दे साक़ी जाम का क्या इंतिज़ारअब्र आया झूम कर मौक़ा नहीं ताख़ीर का
नहीं देता जो मय अच्छा न दे तेरी ख़ुशी साक़ीप्याले कुछ हमेशा ताक़ पर रखे नहीं रहते
दौलत-ए-इ’श्क़-ए-ख़ुदा हासिल हो गरकुछ नहीं अच्छा दिगर इस कार से
कर दिया बर्बाद सारा इ'श्क़ ने जब ख़ानुमाँशहर में चर्चा मेरा फिर घर-ब-घर होने लगा
गए मय पीते हुए आलम-ए-असरार से हममस्त जन्नत में गए ख़ान:-ए-ख़ुमार से हम
है आशिक़ को अपने सनम की क़सममुझे तेरे ख़ाक-ए-क़दम की क़सम
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