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रंग-ए-दस्त आवेज़-ए-उल्फ़त देख कहती है हिनाअब तो हाथों-हाथ सौदा तुझ से जानाँ बन गया
ये जानने को कि हम किस अदा पे मरते हैंजहाँ में तेरी हर-हर अदा का नाम हुआ
तेरे दर से न उठा हूँ न उठूँगा ऐ दोस्तज़िंदगी तेरे बिना ख़्वाब है अफ़्साना है
बे-ख़ुदी की यही तकमील है शायद ऐ दोस्ततू जो आता है तो मैं होश में आ जाता हूँ
जौर-ओ-जफ़ा का मुझ से गिला भी न हो सकेपास-ए-अदब से तर्क-ए-जफ़ा भी न हो सके
अपना बे-ख़ुद मुझे लिल्लाह बना ले साक़ीबुर्क़ा’ फिर चेहरा-ए-अनवर से हटा ले साक़ी
साक़ी ने पस-ए-मुर्दन प्यासा न मुझे छोड़ाइक अब्र के टुकड़े से मय क़ब्र पे बरसा दी
का'बा हो बुत-कदा हो कि वो कू-ए-दोस्त होदिल तेरा चाहे जिस में उसी घर में जा के पी
ख़ुशी है ज़ाहिद की वर्ना साक़ी ख़याल-ए-तौबा रहेगा कब तककि तेरा रिंद-ए-ख़राब 'अफ़्क़र' वली नहीं पारसा नहीं है
मय-कदा दूर है मैं ज़ार हूँ साक़ी है ख़फ़ाहाय किस वक़्त में ख़ाली मिरा पैमानः हुआ
पहचानता वो अब नहीं दुश्मन को दोस्त सेकिस क़ैद से असीर-ए-मोहब्बत रिहा हुआ
गवारा किस को हो साक़ी ये बू-ए-ग़ैर सहबा केकिसी ने पी है साग़र में जो बू है ग़ैर-ए-साग़र में
जल्वा-ए-रुख़सार-ए-साक़ी साग़र-ओ-मीना में हैचाँद ऊपर है मगर डूबा हुआ दरिया में है
सय्याद की रज़ा ये हम आँसू न पी सकेउ’ज़्र-ए-ग़म-बहार किया हाए क्या किया
वो मल के दस्त-ए-हिनाई से दिल लहू करतेहम आरज़ू को हसीं ख़ून-ए-आरज़ू करते
मय से चुल्लू भर दे साक़ी जाम का क्या इंतिज़ारअब्र आया झूम कर मौक़ा नहीं ताख़ीर का
नहीं देता जो मय अच्छा न दे तेरी ख़ुशी साक़ीप्याले कुछ हमेशा ताक़ पर रखे नहीं रहते
नज़र-अफ़ज़ोई-ए-शम-ए-तजल्ली ऐ ज़हे-क़िस्मतकहाँ बज़्म-ए-जमाल उन की कहाँ परवानगी अपनी
ऐ शम-ए-दिल-अफ़रोज़ शब-तार-मोहब्बततुझ से ही है ये गर्मी-ए-बाज़ार-ए-मोहब्बत
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