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शे'र
फ़क़ीर-ए-‘कादरी’ जो देखते हैं चश्म-ए-बीना सेतो बंदे को ख़ुदा कहने की जुर्अत आ ही जाती है
फ़क़ीर क़ादरी
शे'र
मुझे तुम देखते हो और उस हसरत से मैं तुम कोकि बुलबुल रू-ए-गुल को और गुल बुलबुल के अरमाँ को
राक़िम देहलवी
शे'र
क़फ़स में भी वही ख़्वाब-ए-परेशाँ देखता हूँ मैंकि जैसे बिजलियों की रौ फ़लक से आशियाँ तक है
बेदम शाह वारसी
शे'र
किस घर में किस हिजाब में ऐ जाँ निहाँ हो तुमहम राह देखते हैं तुम्हारी कहाँ हो तुम