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शे'र
न होती दिल में उल्फ़त अपनी क्यूँ क़ातिल के अबरू कीकि मुझ को तो क़तील-ए-ख़ंजर-ए-सफ़्फ़ाक होना था
अर्श गयावी
शे'र
दवाँ हो कश्ती-ए-उ’म्र-ए-रवाँ यूँ बहर-ए-हस्ती मेंकहीं उभरी कहीं डूबी कहीं मा’लूम होती है
अफ़क़र मोहानी
शे'र
शह-ए-बे-ख़ुदी ने अता किया मुझे अब लिबास-ए-बरहनगीन ख़िरद की बख़िया-गरी रही न जुनूँ की पर्दा-दरी रही