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शे'र
हर क़दम के साथ मंज़िल लेकिन इस का क्या इ’लाजइ’श्क़ ही कम-बख़्त मंज़िल-आश्ना होता नहीं
जिगर मुरादाबादी
शे'र
नई है बिलकुल नई है साहब ये दास्ताँ जो सुना रहा हूँअभी अभी ही बना हूँ बंदा पहले मैं भी ख़ुदा रहा हूँ
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
शे'र
हर अदा नाज़ में है नोक-चौक उस के 'फ़िराक़'खुब गई जी में हमारे यार की बाँकी तरह
हकीम सनाउल्लाह ख़ान
शे'र
लगा दी आग उन के शो'ला-ए-आरिज़ ने गुलशन मेंज़र-ए-गुल बन गईं चिंगारियाँ फूलों के दामन में
हसन इमाम वारसी
शे'र
हुआ आईना से इज़हार उन का रू-ए-ज़ेबा हैबना मुम्किन है वाजिब से जो शनवा है वो गोया है
हकीम मीर यासीन अली
शे'र
ब-रोज़-ए-हश्र हाकिम क़ादिर-ए-मुतलक़ ख़ुदा होगाफ़रिश्तों के लिखे और शैख़ की बातों से क्या होगा
हरी चंद अख़्तर
शे'र
लाया तुम्हारे पास हूँ या पीर अल-ग़ियासकर आह के क़लम से मैं तहरीर अल-ग़ियास
शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
शे'र
उ’मूमन ख़ाना-ए-दिल में मोहब्बत आ ही जाती हैख़ुदी ख़ुद-ए’तिमादी में बदल जाये तो बंदों को