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शे'र
ग़ज़ब की चाल गुलशन में चला है बाग़बाँ 'मोहसिन'इसी का ये नतीज: है कि पामाल-ए-सऊबत हूँ
शाह मोहसिन दानापुरी
शे'र
लफ़्ज़-ए-उल्फ़त की मुकम्मल शर्ह इक तेरा वजूदआ'शिक़ी में तोड़ डालीं ज़ाहिरी सारी क़ुयूद
अज़ीज़ वारसी देहलवी
शे'र
मन पाया है उस ने दिल मेरा काबा है घर अल्लाह का हैअब खोद के उस को फिकवा दे वो बुत न कहीं बुनियाद सती
ग़ुलाम नक़्शबंद सज्जाद
शे'र
तुम को कहते हैं कि आशिक़ की फ़ुग़ाँ सुनते होये तो कहने ही की बातें हैं कहाँ सुनते हो
मीर मोहम्मद बेदार
शे'र
कब दिमाग़ इतना कि कीजे जा के गुल-गश्त-ए-चमनऔर ही गुलज़ार अपने दिल के है गुलशन के बीच
मीर मोहम्मद बेदार
शे'र
जब आग धदकती हो उस पर मत छीटियो तेल ख़ुदा रा तुमक्या दिल की ख़ुशी को पूछो हो ऐ यारो इक नाशाद सती
ग़ुलाम नक़्शबंद सज्जाद
शे'र
जब आग धदकती हो उस पर मत छीटियो तेल ख़ुदा रा तुमक्या दिल की ख़ुशी को पूछो हो ऐ यारो इक नाशाद सती
ग़ुलाम नक़्शबंद सज्जाद
शे'र
जुज़ तेरे नहीं ग़ैर को रह दिल के नगर मेंजब से कि तिरे इश्क़ का याँ नज़्म-ओ-नसक़ है