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शीशे में हसीं बादा-ए-गुल-फ़ाम हसीं हैमय-ख़ाना-ए-इस्लाम का हर जाम हसीं है
हसीन भी हूँ ख़ुश-आवाज़ भी फ़रिश्ता-ए-क़ब्रकटी है उम्र हसीनों से गुफ़्तुगू करते
जब तक एक हसीं मकीं था दिल में हर-सू फूल खिले थेवो उजड़ा तो गुलशन उजड़ा और हुआ आबाद नहीं है
जी उठे मुर्दे तिरी आवाज़ सेफिर ज़रा मुत्रिब उसी अंदाज़ से
मेरा दम भी समा'अ' में निकलेअब यही है इक आरज़ू ख़्वाजा
ऐ 'फ़ना' तेरी तक़दीर मेंसारी दुनिया के ग़म रह गए
गिर्दाब-ए-गुनाह में फँसे हैंदामान-ए-दिल-ओ-निगाह-तर है
लगते हैं ये मेहर-ओ-माह-ओ-अंजुमदेहली के चराग़ ही का परतव
घर हुआ गुलशन हुआ सहरा हुआहर जगह मेरा जुनूँ रुस्वा हुआ
जब भी ख़त लिखने बैठे उन्हेंसिर्फ़ ले कर क़लम रह गए
शायद कि यही आँसू काम आएँ मोहब्बत मेंहम अपनी मता-ए-ग़म बर्बाद नहीं करते
उन को गुल का मुक़द्दर मिलामुझ को शबनम की क़िस्मत मिली
गुल तो गुल ख़ार तक चुन लिए हैंफिर भी ख़ाली है गुलचीं का दामन
रफ़्तार यार का अगर अंदाज़ भूल जायेगुलशन में ख़ाक उड़ाती नसीम-ए-सहर फिरे
कुछ दर्द की शिद्दत है कुछ पास-ए-मोहब्बत हैहम आह तो करते हैं फ़रियाद नहीं करते
हम गुलशन-ए-फ़ितरत से जीने की अदा लेंगेशाख़ों से लचक लेंगे काँटों से अना लेंगे
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